न राम हूँ, न राम सा मुझको बनना है,
जैसा भी हूँ बस सही-गलत समझना है।
खुद को जितनी समझ आए बस उतनी ही मर्यादा में रहना,
न मैं भगवान, न ही भगवान सा मुझको बनना है।
खुद की समझ से सही-गलत समझ सकूँ,
बस ऐसा मुझको बनना है।
मैं एक सा ही पर समय-समय पर हर एक को ही बदला-बदला नज़र आता हूँ,
वो खुद को देखते नहीं और इल्ज़ाम पूरा मुझ पर आ जाता है।
पर क्या करूँ, मैं दिल में दिमाग रखता नहीं,
जैसा मैं खुद नहीं ,वैसा किसी को समझता नहीं।
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