ख़ुद से ही.....

ख़ुद की ख़ुद से ही लड़ाई है,
पता नहीं ये कैसी जग हँसाई है।

ख़ुद से बातें, ख़ुद पर गुस्सा,
ख़ुद से ही, अब ख़ुद ही पराये हैं।

ख़ामोशी में भी शोर है,
और शोर में एक सन्नाटा है,
पता नहीं ख़ुद से ही
ये कैसा आटा-साटा है।

ख़ुद को घुमाकर ख़ुद ही लाता हूँ,
ख़ुद को फिर ख़ुद ही छोड़कर आता हूँ,
फिर साथ ख़ुद के ख़ुद ही रह जाता हूँ,
ऐसे ही मैं ख़ुद को ख़ुद ही भूल जाता हूँ।

ख़ुद से ही चिढ़ पर
ख़ुद को ही समझाता हूँ,
फिर समझाते-समझाते
ख़ुद से ही चिढ़ जाता हूँ।
ख़ुद से ख़ुद की लड़ाई में,
ना हार ना ही जीत पाता हूँ,

क्या मैं ऐसा हूँ,
बस यही सोचकर
फिर सो जाता हूँ।

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