मुझे
जलाने आओ तो फिर, बस इतना तुम याद रखना,
बैठो मेरे पास अगर तो, मुझको ही तुम याद करना।
भीड़
तो होगी—खूब मगर, चर्चाओं में न खोना तुम,
पीठ
न दिखाना मुझको तुम, बस मुझे ही देखा करना तुम।
आँखें
मेरी बंद होंगी, फिर भी नज़रें मिलाऊँगा,
महसूस
करोगे मुझको तो, बहुत कुछ कह जाऊँगा।
कुछ
नाम मेरा पुकारेंगे, पर आवाज़ वहीं की वहीं
गूँजेगी,
मेरे
न होने की सच्चाई अब सबके भीतर बैठेगी।
जैसा
भी था—अच्छा, बुरा, अब कोई हिसाब न लगाएगा,
मेरे
जाते ही हर ज़ुबान पर “अच्छा इंसान था” रह जाएगा।
जो
बातों में काँटा था कभी, अब यादों में फूल बन जाऊँगा,
मेरे
रहते जो समझ न पाए, अब सबको समझ आ जाऊँगा।
आग
की लपटों में घिरा हुआ, अब कोई शोर न मचाऊँगा,
है से था के इस सफ़र में पता
नहीं कहाँ रह जाऊँगा।
अब
न कोई सवाल बचेगा, न ही शब्दों से कोई बवाल उठेगा।
जो मुझे समझ सके न कभी, उनको अब बस मेरी
कमी का एहसास रहेगा।
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