ना हॅू रोशनी, किसी की ऑखों की, ना हूॅं चौन, किसी के दिल का मैं,
जो काम किसी के, आ ना सके, मुट्ठी भर बस, वही धूल हॅू मैं।।
ना दवा किसी के दर्द की मैं, ना सुकून किसी की आखों का,
ना हवा सा तेरे पास कहीं मैं, ना ही तेरी, मीठी नींद हूॅ मैं।।
क्यो दुआ करे, मेरे लिए कोई, क्यो आए, चढ़ाने फूल कोई,
क्यो दीप जलाए, मेरे लिए कोई, जब मान चुके सब, बेकार हूॅ मैं।।
ना रागए, ना अनुराग हॅू मैं,ना भाग्य, ना चरित्र हूॅ मैं,
जो टूट चुका, आकार वही मैं, जो उतर चुका, श्रृंगार वही मैं।।
मैं राग ना कोई जीवन का, क्यो सुनने, कोई बैठेगा,
मै आवाज़ हूॅ, एक दर्द भरी, कोई कैसे सुन कर हॅंस देगा।।
बस एक जगह ही ठहरा हॅू मैं, ना पास किसी सेे, ना ही दूर हॅू मैं,
जो बदल गया, वही भाग्य हॅू मैं, जहॉ पहुॅच ना सके, वही मंजिल हॅू मैं।।
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